*सात सितंबर से होने वाली सिमली चण्डिका देवी भ्रमण यात्रा की हुई पूरी तैयारी*

खबर शेयर करें

चमोली

*सात सितंबर से होने वाली सिमली चण्डिका देवी भ्रमण यात्रा की हुई पूरी तैयारी*

सिमली क्षेत्र के दर्जनों गांवों की आराध्य देवी चण्डिका के सात सितम्बर से होने वाली (बन्याथ) भ्रमण यात्रा को लेकर आयोजकों द्वारा पूरी तैयारी कर ली गई है। चंडिका देवी मंदिर को फ़ूल मालाओं से सजाया गया है। श्रद्धालुओं भक्तों को किसी तरह से परेशानी नही हो मंदिर समिति द्वारा पेयजल, धूप व बारिश से बचाव के लिए वाटर प्रूफ टैन्ट, भण्डारे जैसी ब्यवस्थाऐं की गयी हैं ।


सिमली में पिण्डर नदी के वाम पार्श्व पर स्थित गोल गोविन्द गुणसाई राज राजेश्वरी मां चंडिका देवी का मंदिर स्थित है। मां चंडिका के इस स्थान पर स्थापित होने पर भी कुछ ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। बुजुर्गों के अनुसार सन् 1800 ई के आरम्भ में विधर्मियो द्वारा हिन्दुओं के मंदिरों पर भी धर्मध्वस्तता हेतु आक्रमण किया गया। इस आक्रमण से काष्ट निर्मित आभूषणों से सुसज्जित चंडिका का यह फर्श -मुखोटा पिण्डर नदी में प्रवाहित होते हुए नौली नामक स्थान पर स्नान करते हुए रतूड़ा गांव के रतूड़ी ब्राह्मण को मिला और फर्श को नमन करते हुए रतूडि ब्रह्मण ने नदी में प्रवाहित कर दिया। तत्कालीन गैरोला वंश के पुजारी ने स्थानीय सिमली सैनू सुन्दर गांव जाख आदि गांवों के ग्रामीणों से इसकी स्थापना की चर्चा की और उसे मंदिर के पश्चिम भाग में स्थापित किया ।


उत्तराखंड में देवी देवताओं की लोकयात्राओ का प्रचलन सदियों से है तथा इस यात्रा का आयोजन प्रत्येक बारह वर्षों में मनाने की परम्परा है । चंडिका देवी सिमली संवत 2081भाद्रपद 0 7 सितम्बर 2024 को मंदिर के गर्भगृह से बाहर आयेगी और 11 सितम्बर से यात्रा पर चली जाएगी। देवी के धर्म भाई लाटू देवता बाजे भुकारें सहित मंदिर परिसर में 7 सितम्बर को पहुंचेंगे। भाई बहन के मिलन का यह दृश्य बड़ा ही लालायित एवं वाद्य यंत्रों की थाप व ताल से रोमांचित करने वाला होता है। उत्साह पूर्ण लालसा को संजोए हुए इस दिन मंदिर में हजारों श्रद्धालुओं की भीड इकठ्ठा रहती है। लाटू देवता के पश्वा पर देवता अवतारित होते ही उनके द्वारा देवी को बाहर लाने की स्वीकारोक्ति से देवी को अस्थाई स्थान पर स्थापित किया जाता है और दुसरे दिन देवी की रात दिन अधिवास पूजा के सांथ दैनिक पूजा पाठ का क्रम चलता है।
तीसरे दिन देवी यात्रा के निमित्त एक माह से प्रशिक्षित ऐरवाले देवी की नृत्य कला में दक्ष व बालध्यौ के संवाहक का मुण्डन व अभिषेक स्नान करा कर वैदिक विधि विधान से यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है। देवी के सम्मुख पूरी निष्ठा व श्रद्धा से देवी कार्य को सम्पन्न करने हेतु दीक्षा दी जाती है तथा सांय काल की पूजा के उपरांत यात्रा के संवाहक ब्रह्म निशान की शक्तीकरण की पूजा रात भर चलती है। यह ब्रह्म निशान मूल रुप से पुरुष का प्रतीक व देवी को प्रक‌ति का रूप माना गया है । दैनिक नित्य पूजा के बाद यात्रा का संवाहक ब्रह्म निशान को गणाई द्वारा भ्रमण हेतु तैयार किया गया। ब्रह्म निशान के यात्रा हेतु बाहर आते हि बहुत से देवी देवता अवतारित हो जाते हैं। गंणाई द्वारा ब्रह्म निशान को ऐरवालो के पास दे कर पुजारी द्वारा देवी के फर्श को सुन्दर गांव के ऐरवाले देव डोली को कंधे पर रखने वाले के पास देते ही ब्रह्म निशान द्वारा देवी के सांथ मंदिर की परिक्रमा करते ही दस माह की यात्रा (बन्याथ) को प्रस्थान करते हैं। चण्डिका देवी भ्रमण यात्रा का पहला पड़ाव रतूड़ा गांव में होगा।


खबर शेयर करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *