अभी भी कई गांव सड़को से कोसो दूर बीमार मरीज क़ो डंडी कंडी के सहारे उपचार के लिए पंहुचा रहें अस्पताल

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अभी भी कई गांव सड़को से कोसो दूर

बीमार मरीज क़ो डंडी कंडी के सहारे उपचार के लिए पंहुचा रहें अस्पताल
चमोली 

एक तरफ जहां सरकारें और जनप्रतिनिधि सडकों के जाल बिछाने की बात कहकर अपनी पीठ खूब थप-थपाते रहते हैं वहीं पहाडों मे धरताल पर आज भी विभिन्न क्षेत्रों में सडकों के अभाव में ग्रामीणों को बडी दिक्कतों का सामना करना पडता है।कई ग्रामीण इलाकों में आजतक मोटर मार्गों के निर्माण नहीं हो सकने के चलते जहाँ हर दिन छात्र-छात्राओं को स्कूल -कालेज आने-जाने,आम ग्रामीणों का रोजमर्रा की आवश्यकताओं के लिए ब्लाक तथा जिला मुख्यालय आदि स्थानों के आवागमन में परेशानियां झेलनी पडती ही है।

तो वहीं दूसरी और बिमार लोगों और प्रसूता महिलाओं को आज भी लोग डंडी-कंडी के सहारे कांधों पर लादकर शहरों के अस्पतालों तलक लाना पडता है, जिसमें कई बार बिमार लोगों और गर्भवती महिलाओ को जान तक गंवानी पडती है।

वैसे बिना मोटर मार्गों के चलते बहुत सारे गांव आज भी परेशान हैं तो ताजा मामला जनपद के देवाल ब्लॉक के ऐरठा गांव का हैं जहाँ चालीस वर्षीय एक व्यक्ति पूरन राम की तबियत खराब होने पर ग्रामीणों ने उंहें पांच कीलोमीटर तंग पहाडी और चट्टानी पगडंडियों से डंडी में लादकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुचाया जहां उनका प्राथमिक उपचार करने के बाद हायर सेंटर रैफर किया गया है।बताते चलें कि यहां ऐरठा गांव अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव है जहाँ लोगों की वर्षों पुरानी एक सडक की मांग आज भी धरातल पर नहीं उतर पाई है। यहाँ के स्कूली बच्चे भी हर दिन इसी पहाडी और जंगल का पैदल रास्ता तय करके हर मौसम में अपने गांव से पाँच कीलोमीटर दूर देवाल तक अपने-अपने स्कूल-कालेजों के लिए जान जोखिम में डालकर आवागमन करते हैं, जिस कारण छात्र-छात्राओं के परिजनों को उनके स्कूल जाने तथा घर वापस लौटने तक चिंता सताए रहती हैं।इन सबसे तो यही लगता है कि पहाड के लोगों की नीयति बन गई है अपनी जान को जोखिम में डालकर जीने की।
तस्वीरों में आप साफ देख सकते हैं कि किस तरह ग्रामीण बिमार व्यक्ति को कांधे पर लादकर ले जा रहे हैं, ऊपर पहाडी, तंग रास्ता और नीचे पिंडर नदी की गहराई।चलने में थोडी सी भी भूल, बडी अनहोनी को जन्म दे सकती हैं।


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