वीर चंद्र सिंह गढ़वाली: ‘गोली का जवाब गोली से नहीं’ देने वाले शहीद को नमन

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वीर चंद्र सिंह गढ़वाली: ‘गोली का जवाब गोली से नहीं’ देने वाले शहीद को नमन
_कोदियाबगड़ की धरती गवाह है, जहां 12 जून को उमड़ेगा जनसैलाब_
गैरसैंण/चमोली 
उत्तराखंड की वीरभूमि ने अंग्रेजों की बंदूक के सामने सीना तानकर ‘गोली का जवाब गोली से नहीं’ का इतिहास रचने वाले शहीद वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को 12 जून को एक बार फिर श्रद्धासुमन अर्पित करेगा। दूधातोली के कोदियाबगड़ स्थित उनकी समाधि स्थल पर इस दिन क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर अमर बलिदानी को याद करेंगे।

*जब पेशावर में गरज उठा था गढ़वाली का जज्बा*
सन् 1930। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ देश में आजादी की लहर थी। पेशावर में तैनात 2/18 गढ़वाल राइफल्स के जवान वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को आदेश मिला – निहत्थे सत्याग्रहियों पर गोली चलाओ। लेकिन गढ़वाली के खून में देशभक्ति थी, गुलामी नहीं। उन्होंने राइफल नीचे रख दी और अपने साथियों से भी यही कहा। “भाइयों, ये अपने ही हैं। इन पर गोली कैसे चलाएं?”

बस यही एक वाक्य अंग्रेजी साम्राज्य की नींव हिला गया। वीर चंद्र सिंह गढ़वाली को गिरफ्तार कर लिया गया और कालेपानी की सजा दी गई। अंडमान की जेल में उन्होंने जो यातनाएं सहीं, वो उत्तराखंड के हर घर की प्रेरणा बन गईं।

*कोदियाबगड़: शौर्य की समाधि*
दूधातोली के बुग्यालों के बीच बसी कोदियाबगड़ की समाधि आज भी उस शौर्य की गवाह है। हर साल 12 जून को यहां मेला लगता है। लोग मानते हैं कि जब-जब उत्तराखंड पर संकट आया, वीर चंद्र सिंह का नाम ही लोगों का हौसला बना।

*12 जून को लगेगा मेले का रंग*
इस वर्ष भी 12 जून 2026 को नगर पंचायत गैरसैंण, स्थानीय सामाजिक संगठनों और क्षेत्रवासियों के सहयोग से भव्य श्रद्धांजलि सभा आयोजित होगी। कार्यक्रम में देशभक्ति गीत, गढ़वाली लोकगाथाएं और शहीद के जीवन पर आधारित नाटिका प्रस्तुत की जाएगी।

नगर पंचायत अध्यक्ष ने अपील की है कि अधिक से अधिक संख्या में लोग कोदियाबगड़ पहुंचकर इस महान शहीद को नमन करें। उन्होंने कहा, “वीर चंद्र सिंह गढ़वाली सिर्फ एक नाम नहीं, उत्तराखंड की अस्मिता हैं। उनका आदर्श – अन्याय के सामने झुकना नहीं – आज भी हमें राह दिखाता है।”

*कौन थे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली?*
– जन्म: 1891, गांव क्यूंठा, पौड़ी गढ़वाल
– कर्म: गढ़वाल राइफल्स के हवलदार, 1930 पेशावर कांड के नायक
– सजा: कालेपानी, अंडमान निकोबार
– देहांत: 1979
– विरासत: ‘अहिंसा से बड़ा कोई हथियार नहीं’ का संदेश

आज जब देश विभाजन और नफरत की बातें करता है, वीर चंद्र सिंह गढ़वाली का जीवन हमें याद दिलाता है कि असली वीरता दुश्मन को मारने में नहीं, अपनेपन को बचाने में है।

_12 जून, कोदियाबगड़। आइए, उस मिट्टी को छूकर आएं जिसने एक ऐसा सपूत दिया जिसने गोली के सामने कलम रख दी।_


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